नैमिषारण्य

भारत का उत्तर प्रदेश राज्य देवो की जन्म भूमि के नाम से विख्यात है। यहाँ भगवान राम और श्री कृष्ण का जन्म हुआ है, जिस वजह से अयोध्या और मथुरा जाने जाते हैं जो उत्तर प्रदेश के विश्व प्रसिद्ध शहर हैं। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के पास में एक ऐसा स्थान है जिसे ऋषियों की तपोभूमि और श्री राम द्वारा किये गए अश्वमेध यज्ञ के लिए जाना जाता है। हम बात कर रहे हैं “नैमिषारण्य” की, जिसे नीमसार और नैमिष धाम के नाम से भी जाना जाता है।

नैमिषारण्य बहुत ही पवित्र स्थली है। इसी स्थली पर भगवान राम द्वारा अश्वमेध यज्ञ किया गया था। हम इस ब्लॉग में नैमिषारण्य से सम्बंधित सभी जानकारियों को आपसे साझा करेंगे। आप नैमिषारण्य में कौन-कौन से दर्शनीय स्थलों को देख सकते हैं इन सभी चीजों को हम इस ब्लॉग के माध्यम से आपसे साझा करेंगे। तो आईये जानते हैं नैमिषारण्य से सम्बंधित जानकारियों को…

विषय सूची

शार्ट जानकारी

जगहनैमिषारण्य / नीमसार या नैमिष धाम
पताउत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले से 40 किलोमीटर दूर गोमती नदी के बाए तट पर
प्रसिद्ध होने का कारणऋषि मुनियो की तपोस्थली, श्री राम द्वारा किये गए अश्वमेध यज्ञ और ब्रह्मा जी के मनोमय चक्र के कारण
निकट रेलवे स्टेशनलखनऊ जंक्शन, सीतापुर रेलवे स्टेशन और हरदोई रेलवे स्टेशन
निकट एयरपोर्टअमौसी एयरपोर्ट लखनऊ

नैमिषारण्य कहाँ पर है?

नैमिषारण्य धाम भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के सीतापुर जिले में स्थित है। सीतापुर से नैमिष धाम की दूरी 40 किलोमीटर है और लखनऊ से यह दूरी 91 किलोमीटर की है। यह उत्तर प्रदेश का बहुत ही प्रसिद्ध तीर्थस्थान है जिस वजह से यहाँ पहुंचना बहुत ही आसान है। यहाँ 88000 हजार ऋषि मुनियों ने तप किया था जिस वजह से यह स्थान तप और ध्यान करने के लिए प्रसिद्ध है।

नैमिषारण्य क्यों प्रसिद्ध है?

नैमिषारण्य एक बहुत पवित्र स्थली है। यह स्थान 88000 हजार ऋषि मुनियों की तपोस्थली और यहाँ की जाने वाली 84 कोश परिक्रमा करने के लिए प्रसिद्ध है। नैमिषारण्य के बारे में कहा जाता है की यहाँ हिन्दू धर्म में माने जाने वाले 33 कोटि देवी देवताओ का वास है। यहाँ ब्रह्मा जी के चक्र द्वारा निर्मित चक्रतीर्थ है तो वहीं दधिचि कुंड है। इस कुंड के बारे में बताया जाता है की इस कुंड में सभी पवित्र नदियों का पानी है। जिस वजह से यहाँ स्नान करना शुभ माना जाता है।

यहीx वह स्थान है जहाँ भगवान राम ने अश्वमेध यज्ञ किया था। यह स्थान चार धाम के लिए जगन्नाथधाम, बद्रीनाथ, द्वारिकाधीश, रामेश्वरम धाम के लिए विख्यात है क्यूंकि इसी जगह महर्षि गोपालदास जी ने इन मंदिरो का निर्माण कराया था। यहाँ बहुत से मंदिर और पवित्र स्थान हैं जिनके वजह से यह इतना प्रसिद्ध है।

नैमिषारण्य की कहानी

नैमिषारण्य एक ऐसा स्थान है जो धार्मिक दृष्टि से बहुत अधिक पवित्र और मोक्ष दायिनी है। इस स्थान का उल्लेख हिन्दू धर्म ग्रंथो में मिलता है और उनमे इससे सम्बंधित बहुत सी बाते और कहानिया बताई गयी हैं। यह एक ऐसा पवित्र स्थान है जिसे स्वयं ब्रह्मा जी के चक्र द्वारा खोजा गया था। यही वह स्थान है जहाँ भगवान राम ने अश्वमेध यज्ञ किया था तो महर्षि व्यास जी ने लोगो को पुराणों की शिक्षा दी थी।

यहाँ बना चक्रतीर्थ इस जगह का प्रमुख आकर्षण और प्राचीनतम सरोवर है। ऐसा माना जाता है की बहुत से ऋषि मुनि एक पवित्र स्थान की तलाश में ब्रह्मा जी के पास पहुंचे और उनसे एक ऐसे स्थान के बारे में पूछा जो ध्यान करने के लिए पवित्र हो। तब ब्रह्मा जी के मन से एक चक्र उत्पन हुआ और ब्रह्मा जी ने कहा की यह चक्र जिस भी स्थान पर गिरेगा वही सबसे पवित्र स्थान होगा।चक्र आकर नैमिषारण्य में गिरा और इसी वजह से इस जगह को ऋषि मुनियों की तपोस्थली कहा जाता है।

नैमिषारण्य का नाम कैसे पड़ा?

इस स्थान का नाम नैमिषारण्य कैसे पड़ा इसके पीछे भी बहुत सी बातें कही जाती हैं। एक मत के अनुसार इस जगह पर बहुत से नेमिष के फल पाए जाते थे, जिस कारण से इस जगह का नाम नैमिषारण्य पड़ा। हिन्दू धर्म के धार्मिक ग्रंथो के अनुसार यहाँ पर भगवान के मनोमय चक्र की नेमि (हाल) गिरी थी जिस वजह से इस जगह का नाम नैमिषारण्य पड़ा।

नैमिषारण्य में कहाँ रुके?

यह एक प्रसिद्ध धार्मिक क्षेत्र है जिस वजह से आपको यहाँ पर रुकने के लिए बहुत सी धर्मशालाए और होटल्स मिल जायेंगे। आप इन होटल्स और धर्मशालाओ को पहले से ऑनलाइन बुक कर सकते हैं इसके साथ ही आप यहाँ आकर भी रूम ले सकते हो। नैमिषारण्य के साथ ही आप सीतापुर और लखनऊ जैसे शहर में भी रुक सकते हैं। लखनऊ में रुकने से आपको लखनऊ घूमने का फायदा होता है। यदि आप समय से पहले यहाँ पहुंच जाते हैं तो आपको लखनऊ घूमने भी सहायता रहेगी।

नैमिषारण्य में स्थित दर्शनीय स्थल

यहाँ पहुंचते ही आपको बहुत से मंदिर और कुंड देखने को मिल जायेंगे। आप नैमिषारण्य में कहाँ-कहाँ और कौन-कौन सी जगहों पर जा सकते हैं और किन-किन धार्मिक जगहों के आपको दर्शन करने चाहिए अब हम उनके बारे में विस्तार से जानेगे और जगहों से सम्बंधित कुछ जानकारियों को आपसे साझा करेंगे…

चक्रतीर्थ

नैमिष धाम पहुंच कर आपको सबसे पहले चक्रतीर्थ के दर्शन करने चाहिए। यह के सरोवर और कुंड है, जिसमे स्नान करना बहुत ही शुभ माना जाता है। इस चक्र तीर्थ का सम्बन्ध ब्रह्मा जी से है। ऐसे माना जाता है की बहुत से ऋषि मुनि कलयुग में तप और ध्यान करने के लिए एक शांत और पवित्र जगह की तलाश में थे। सभी ऋषि मुनि मिलकर ब्रह्मा जी के पास जाते हैं और उनसे इस जगह के बारे में बताने के लिए आग्रह करते हैं। ब्रह्मा जी के मनोमय से एक चक्र उत्पन होता है। ब्रह्मा जी चक्र की ओर इशारा करते हुए कहते हैं कि जिस जगह आकर यह चक्र गिरेगा वही सबसे सबसे पवित्र स्थान होगा।

चक्रतीर्थ वही स्थान है जहाँ ब्रह्मा जी का चक्र गिरा था। अब यहाँ एक सरोवर बना हुआ है। जब लोग यहाँ आते हैं तो सबसे पहले इसी कुंड में स्नान करते हैं और फिर कुंड के चारो ओर बने मंदिरो में पूजा और दर्शन करने के लिए जाते हैं।

ललिता देवी मंदिर

ललिता देवी मंदिर यहाँ बने सबसे सुन्दर मंदिरो में से एक है। ललिता देवी मंदिर माता के 108 शक्ति पीठो में से एक है। ऐसा माना जाता है जब माता सती अपने पिता राजा दक्ष के द्वारा कहे अपशब्द को न सह सकी तब उन्होंने यज्ञ कुंड में कूद कर अपनी जान दे दी। शंकर जी ने माता सती के शरीर को उठाकर तांडव करना शुरू कर दिया जिससे पृथ्वी के नष्ट होने का खतरा बना गया।

माँ ललिता देवी मंदिर नैमिषारण्य में स्थित माता का एक शक्ति पीठ जो नैमिषारण्य का एक बहुत ही पवित्र मंदिर है।

तब विष्णु जी ने माता के शरीर के 108 टुकड़े कर दिए और यह शरीर के हिस्से पृथ्वी पर जहाँ-जहाँ गिरे वहां एक शक्ति पीठ का निर्माण हुआ। नैमिषारण्य में माता का हृदय गिरा था जिस वजह से इस मंदिर को माता के शक्ति पीठ में से एक माना जाता है।

पांडव किला

चक्र तीर्थ में स्नान और माता ललिता देवी के दर्शन करने के पश्चात आप चक्र तीर्थ से कुछ दूरी पर स्थित पांडव किला की ओर निकल जाए। पांडव किला में आप भगवान कृष्ण और पांडवो के दर्शन कर सकते हैं। इस क़िले के बारे में बताया जाता है की वनवास के दौरान पांडव इसी किले में रुके थे। यह किला आज भी मौजूद है और अपने अस्तित्व की गवाही दे रहा है।

हनुमान गढ़ी

पांडव किला से कुछ दूरी पर स्थित है हनुमान मंदिर, जिसे हनुमान गढ़ी भी कहा जाता है। यह मंदिर नैमिषारण्य का बहुत ही प्रसिद्ध और भव्य मंदिर है। यहाँ भगवान श्री राम के परम भक्त हनुमान जी की बहुत ही सुन्दर और भव्य मूर्ति स्थापित है। जिसके आप दर्शन कर सकते हैं।

खाटू श्याम मंदिर

चक्रतीर्थ और हनुमान मंदिर के बीच में पड़ता है खाटू श्याम मंदिर। जो बहुत ही बड़ा और सुन्दर है। इस मंदिर में हर समय भजन कीर्तन होते रहते हैं। इस मंदिर में दर्शन करना भी बहुत ही शुभ माना जाता है। तो आप रास्ते में पड़ने वाले इस मंदिर में जरूर दर्शन करे।

देवदेवेश्वर धाम

देवदेवेश्वर धाम हुनमान मंदिर से आगे कुछ दूरी पर स्थित है। यहाँ बना यह छोटा सा शिव मंदिर बहुत ही पौराणिक और भगवान शिव के शिवालयों में से एक है। इस मंदिर का उल्लेख वायुपुराण में भी मिलता है।

चार धाम मंदिर

नैमिषारण्य में चार धाम मंदिर भी स्थापित हैं। यहाँ जगन्नाथ मंदिर, बद्रीनाथ, द्वारिकाधीश और रमेश्वरमधाम मंदिर बने हुए हैं। इन मंदिरो के बारे में बताया जाता है की इन मंदिरो को महर्षि गोपाल दास जी ने बनवाया था। महर्षि गोपाल दास जी उन कुछ महाऋषियों में से एक थे जिन्होंने चारो धामों की यात्रा पूर्ण की थी। यात्रा पूर्ण करने के बाद वे यहाँ पहुंचे और उन्होंने यहाँ चार धाम मंदिरो को बनाने का संकल्प लिया। चार धाम मंदिर ललिता देवी मंदिर से 1 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। तो आपको इन मंदिरो के दर्शन भी जरूर करने चाहिए।

भुतेश्वरनाथ मंदिर

नैमिषारण्य में सबसे प्रमुख मंदिर में से एक, भुतेश्वरनाथ मंदिर है। यदि आप यहाँ एक या दो दिन रुकते हैं तो आपको इस मंदिर में होने वाली सुबह और शाम की आरती में जरूर शामिल होना चाहिए। इस मंदिर में भगवान शिव की एक प्राचीन शिवलिंग स्थापित है। यह मंदिर ललिता मंदिर के पास में ही कुछ दूरी पर स्थित है तो आपको इस मंदिर में दर्शन करने के लिए जरूर जाना चाहिए।

देवपुरी मंदिर

नैमिष धाम में देवपुरी एक और बहुत ही सुन्दर और भव्य मंदिर है। यदि आप 108 देवी देवताओ के दर्शन एक साथ करना चाहते हो तो आपको देवपुरी मंदिर में आना चाहिए। यह मंदिर बहुत ही विशाल बना हुआ है और इस मंदिर में आकर दर्शन करना भी बहुत ही अच्छा माना जाता है।

व्यास गद्दी

भुतेश्वरनाथ मंदिर से आगे कुछ दूरी पर व्यास गद्दी है। व्यास गद्दी के पास एक वटवृक्ष है। कहते हैं इसी गद्दी पर बैठकर व्यास जी ने वेद पुराणों की की शिक्षा अपने शिष्यों को दी थी। व्यास जी ने उत्तराखंड में स्थित माणा गांव में वेद पुराणों की रचना की थी और यहाँ आकर उन्होंने इसकी शिक्षा दी थी।

सूत गद्दी

यह स्थान नैमिष धाम में एक टीले पर स्थित है। इस जगह के बारे में कहा जाता है की महर्षि सूत इस जगह पर 88000 हजार ऋषि मुनियो को शिक्षा दिया करते थे। यह स्थान भी नैमिष धाम का बहुत ही पवित्र स्थान है।

नैमिषारण्य की यात्रा कितने दिन की होगी

यदि नैमिषारण्य में घूमने की बात करे तो इस जगह को पूरा घूमने के लिए आपको लगभग 2 से 3 दिन चाहिए। नैमिषारण्य में बहुत से मंदिर और पवित्र स्थान हैं जिन्हे घूमने में आपको 2 से 3 दिन लगेंगे। यह एक ऐसा स्थान है जहाँ आप सभी 33 कोटि देवी देवताओ के दर्शन कर सकते हो। इसके साथ ही यहाँ पर किये गए दर्शन किसी बड़े मंदिर में किये गए दर्शन के बराबर ही हैं। तो आप एक बार नैमिष धाम की ट्रिप जरूर करे।

नैमिषारण्य कैसे पहुंचे?

नैमिषारण्य उत्तर प्रदेश के राजधानी लखनऊ के पास स्थित है। यह शहर बहुत अधिक प्रसिद्ध है जिस कारण यहाँ तक पहुंचना बहुत ही आसान है। यह स्थान लखनऊ से लगभग 91 किलोमीटर की दूरी पर है और सीतापुर जिले से यह 40 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इन दोनों जगहों से आप बस और टैक्सी द्वारा आसानी से यहाँ तक पहुंच सकते हैं। तो आईये विस्तार से जानते हैं की आप यहाँ तक कैसे पहुंच सकते हैं…

सड़कमार्ग द्वारा कैसे पहुंचे?

नैमिषारण्य लखनऊ के पास स्थित है। यह स्थान सड़कमार्ग द्वारा बहुत ही अच्छे से जुड़ा हुआ है। आपको नैमिषारण्य के लिए बस और ऑटो सीतापुर और लखनऊ से आराम से मिल जायेंगे। लखनऊ केसरबाग़ बस अड्डे से आपको आसानी से यहाँ के लिए बस मिल जाएँगी। अधिकतर बरेली और इसके आस पास के शहर से आने वाले लोग लखनऊ और अयोध्या की यात्रा के बीच में नीमसार आना पसंद करते हैं। बरेली से नीमसार की दूरी 169 किलोमीटर की है। बरेली से आप सरकारी बस द्वारा आराम से नैमिषारण्य पहुंच सकते हैं।

रेलमार्ग द्वारा कैसे पहुंचे?

नैमिषारण्य पहुंचने का सबसे अच्छा साधन रेलमार्ग है। नैमिषारण्य में एक रेलवे स्टेशन भी है लेकिन यह छोटा रेलवे स्टेशन है जो इसके आस पास के ही स्टेशन से जुड़ा हुआ है। नैमिषारण्य के पास में लखनऊ, सीतापुर और हरदोई जैसे रेलवे स्टेशन मौजूद हैं जो उत्तर प्रदेश और देश के कई बड़े रेलवे स्टेशन से जुड़े हुए हैं। लखनऊ जंक्शन के लिए ट्रेन मिलना आसान है और लखनऊ जंक्शन से नैमिषारण्य के लिए टैक्सी भी आसानी से मिल जाती हैं। तो आप अपने शहर से ट्रेन द्वारा लखनऊ जंक्शन पहुंचे और फिर वहां से प्राइवेट शेयरिंग ऑटो द्वारा आप आसानी से नैमिषारण्य पहुंच सकते हैं।

हवाईमार्ग द्वारा कैसे पहुंचे?

नैमिषारण्य आप हवाईमार्ग द्वारा भी पहुंच सकते हैं। नैमिषारण्य के सबसे नजदीक एयरपोर्ट अमौसी एयरपोर्ट है जो लखनऊ में स्थित है। अमौसी एयरपोर्ट से निकलकर आप लखनऊ बस अड्डे आ जाये, वहां से आपको आसानी से नैमिषारण्य के लिए बस और टैक्सी मिल जाएँगी।

भारत के नैमिषारण्य में टूरिज़म

चूँकि, नैमिषारण्य भारत में सबसे प्राचीन तीर्थस्थल होने के साक्ष्यों वाला स्थान है; यह स्पष्ट है कि लोग अपने जीवनकाल में एक बार तीर्थ नगरी की यात्रा करना चाहेंगे ताकि स्वर्ग में स्थान प्राप्त हो सके, जिसकी कई भक्त कामना करते हैं। नैमिषारण्य में कई मंदिर और धार्मिक स्थल हैं जो हिंदुओं द्वारा पूजनीय और पूजनीय हैं। कई शास्त्रों में उल्लेख किया गया है कि हिंदू धर्म के पौराणिक पात्रों द्वारा कई अनुष्ठान किए गए हैं।

नैमिषारण्य में क्या देखना चाहिए, इसका संक्षिप्त विवरण देने के लिए यहां एक सूची दी गई है:

चक्रतीर्थ:
चक्र तीर्थ नैमिषारण्य में पवित्र माना जाने वाला एक गोलाकार जलाशय है। लोग यहां जलाशय में पवित्र डुबकी लगाने आते हैं। इसे ज्ञान का तालाब माना जाता है और इसका उल्लेख महाभारत, स्कंद पुराण और ब्रह्म पुराण जैसे प्राचीन ग्रंथों में मिलता है। यह वह स्थान था जहां भगवान ब्रह्मा द्वारा फेंका गया पहिया रुका था। तालाब के किनारे कई देवताओं के प्राचीन मंदिर हैं। ऐसा माना जाता है कि पहिया धरती में डूब गया और उस स्थान पर पानी का झरना निकला। झरना इतना शक्तिशाली था कि ऋषि भगवान ब्रह्मा के पास पानी के प्रवाह को नियंत्रित करने के लिए पहुंचे। तब भगवान ब्रह्मा ने ललिता देवी को चक्र को फिर से स्थापित करने और पानी के प्रवाह को नियंत्रित करने की सलाह दी। सोमवती अमावस्या पर लोग यहां बड़ी संख्या में एकत्र होते हैं। आप यहां भूतेश्वरनाथ मंदिर, सूतगद्दी, चक्रनारायण मंदिर, बद्रीनारायण मंदिर, शिवालय भैरव जी और काशीकुंड के दर्शन कर सकते हैं।

हनुमान गढ़ी: पांडव किले के पास हनुमान जी की विशाल प्रतिमा है जो हिंदू धर्म के सबसे पूजनीय देवताओं में से एक हैं। ऐसा कहा जाता है कि यह वही स्थान है जहाँ हनुमान जी अहिरावण राक्षस पर विजय प्राप्त करने के बाद पाताल लोक से प्रकट हुए थे, जिसने युवा राम और लक्ष्मण को त्याग दिया था। इस घटना को दर्शाने के लिए हनुमान जी की विशाल प्रतिमा है जिसके कंधों पर राम और लक्ष्मण बैठे हैं। इसलिए, यह हिंदू धर्म के तीर्थ स्थलों में से एक है। यहाँ गणेश जी, मकरध्वज आदि की मूर्तियाँ देखी जा सकती हैं। मंदिर को दक्षिणेश्वर हनुमान जी भी कहा जाता है क्योंकि हनुमान जी की मूर्ति दक्षिण दिशा की ओर है।

पांडव किला:

चक्रत्रिथ के दक्षिण-पश्चिम की ओर गोमती नदी के किनारे महाकाव्य महाभारत के प्रसिद्ध पात्रों पांडवों का किला है। किंवदंती है कि, यह किला (किला) महाभारत के राजा विराट का था। ऐसा माना जाता है कि पांडव अपने वनवास के दौरान यहाँ रुके थे। वहाँ, आप भगवान कृष्ण के साथ पांडवों की मूर्तियाँ देख सकते हैं। ऐसा कहा जाता है कि 1305 ई. में, इस किले का पुनर्निर्माण अलाउद्दीन खिलजी के एक हिंदू मंत्री ने करवाया था।

ललिता देवी मंदिर:
ऐसा माना जाता है कि भगवान ब्रह्मा की सलाह पर देवी ललिता यहां दो बार प्रकट हुई थीं। एक बार चक्र तीर्थ के पानी को नियंत्रित करने के लिए और दूसरी बार देवासुर संग्राम में राक्षसों का वध करने के लिए। इस घटना का उल्लेख कई हिंदू धर्मग्रंथों में मिलता है। लोग पवित्र चक्र तीर्थ तालाब में स्नान करने के बाद देवी ललिता के दर्शन करने के लिए यहां आते हैं।

यवस गद्दी:
महाकाव्य महाभारत के रचयिता महर्षि व्यास हिंदू धर्म में एक महान ऋषि और विद्वान के रूप में पूजनीय हैं। उन्होंने कई हिंदू शास्त्रों की रचना और संकलन किया था। महर्षि व्यास ने इस स्थान पर तपस्या की थी। ऐसा माना जाता है कि मानव जाति के सबसे पहले जोड़े मनु और सतरूपा ने सृष्टि की रचना के लिए यहीं तपस्या की थी।

हवन कुंड:
हवन कुंड वह अग्नि-वेदी है जिसका उपयोग प्राचीन ऋषि-मुनियों ने यज्ञ और अन्य बलिदान करने के लिए किया है।

मिश्रिख-दधीचि कुंड :
मिश्रिख का उल्लेख हिंदुओं के पवित्र ग्रंथ पद्मपुराण (आदिखंड) में है। ऐसा माना जाता है कि यह वह स्थान है जहां महर्षि दधीचि ने देवताओं के अनुरोध पर अपनी अस्थियों का त्याग किया था। किंवदंती है कि एक राक्षस था, वृत्रासुर। वह देवताओं को बहुत प्रताड़ित कर रहा था। उन्होंने भगवान विष्णु से राक्षस को मारने के लिए उसकी यातनाओं से मुक्ति दिलाने का अनुरोध किया। तब भगवान विष्णु ने कहा कि उसे किसी भी ऐसे हथियार से मारा जा सकता है जो बहुत पवित्र सामग्री से बना हो। सांसारिक सामग्रियों से बने अन्य सभी हथियार राक्षस को मारने में विफल रहे क्योंकि उसने बहुत लंबे समय तक तपस्या करने के बाद दिव्य शक्तियां प्राप्त की थीं। तब देवता ऋषि दधीचि के पास उनकी अस्थियां लेने पहुंचे जो लंबी तपस्या के बाद बहुत पवित्र हो गई थीं। ऋषि दधीचि ने एक महान उद्देश्य के लिए देवताओं के अनुरोध को स्वीकार कर लिया। तब दधीचि

सीता कुंड:
यह वह स्थान है जहाँ सीता ने 14 वर्ष के वनवास से पहले स्नान किया था। राम, सीता और लक्ष्मण तीनों ने यहाँ दर्शन किए थे, इसलिए यह स्थान पूजनीय है।

नैमिषारण्य में कई मंदिर और आश्रम हैं, जहाँ भक्तों को अवश्य जाना चाहिए। यहाँ आपको सामान्य जानकारी देने के लिए सूची दी गई है:

  • पुरम मंदिर
  • माँ आनंदमा का आश्रम
  • स्वामी नारदानंद मंदिर
  • चैतन्य महाप्रभु का परमहंस मठ (गरिया मठ)
  • निकटवर्ती गांव "मुल्ला भीरी" में स्थित मुल्ला भीरी बाबा मंदिर भी लोगों की मनोकामनाएं पूर्ण करने के लिए प्रसिद्ध है। ऐसा कहा जाता है कि जो भी व्यक्ति आस्था के साथ इस स्थान पर आता है, वह कभी खाली हाथ नहीं लौटता।

नैमिषारण्य तीर्थ का महत्व:
ऐसा माना जाता है कि भगवान ब्रह्मा ने कहा था कि यह वह स्थान है जो कलियुग की अराजकता से अछूता रहेगा, जो पृथ्वी पर सृष्टि के विलुप्त होने का भयानक काल है। यह भी महत्वपूर्ण है कि प्राचीन भारत में ज्ञान को सम्मान दिया जाता था और हर संभव प्रयास करके इसे प्राप्त करने की कोशिश की जाती थी, जैसा कि ऋषि शौनक के मामले में हुआ था। ज्ञान को उन स्रोतों में से एक माना जाता है जो मनुष्य को किसी भी पाप और दुनिया की किसी भी अराजकता से मुक्ति दिला सकता है। प्राचीन भारत में ज्ञान को इतना सम्मान दिया जाता था कि विद्वान इसे पाने के लिए वर्षों तक तपस्या करते थे।

नैमिषारण्य तीर्थ का महत्व:
ऐसा माना जाता है कि भगवान ब्रह्मा ने कहा था कि यह वह स्थान है जो कलियुग की अराजकता से अछूता रहेगा, जो पृथ्वी पर सृष्टि के विलुप्त होने का भयानक काल है। यह भी महत्वपूर्ण है कि प्राचीन भारत में ज्ञान को सम्मान दिया जाता था और हर संभव प्रयास करके इसे प्राप्त करने की कोशिश की जाती थी, जैसा कि ऋषि शौनक के मामले में हुआ था। ज्ञान को उन स्रोतों में से एक माना जाता है जो मनुष्य को किसी भी पाप और दुनिया की किसी भी अराजकता से मुक्ति दिला सकता है। प्राचीन भारत में ज्ञान को इतना सम्मान दिया जाता था कि विद्वान इसे पाने के लिए वर्षों तक तपस्या करते थे।

नैमिषारण्य में करने के लिए शीर्ष चीजें


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