Ujjain Darshan

भोपाल। सम्राट विक्रमादित्य के शासन काल में उज्जैन के माता मंदिरों का खास महत्व है। इन्हीं में से एक नगर कोट माता का मंदिर है। स्कंद पुराण के अवंतिका क्षेत्र महात्म्य में इसका जिक्र मिलता है। स्कंद पुराण के अनुसार 24 माताओं में से एक है नगर कोट माता का मंदिर। गोर्धन सागर के पास स्थित मंदिर में माता की मूर्ति भव्य और मनोहारी रूप में विराजमान है।
भव्य आरती का आनंद लेने आते हैं भक्त
मंदिर में सुबह और शाम के समय भव्य पूजा होती है. साथ ही नगाड़ों और घंटियों की गूंज मन को शांति प्रदान करती है। माता का आशीर्वाद पाने और इस ममोहक दृश्य को देखने के लिए यहां भक्तों का तांता लगा रहता है. माता के दर्शन करने से श्रद्धालुओं की सारी मनोकामना पूर्ण हो जाती है। माता के दर्शन पाकर श्रद्धालुओं की पीड़ा दूर हो जाती है।
माता का नाम क्यों पड़ा नगरकोट की रानी?
ऐसा कहा जाता है कि नगरकोट की रानी प्राचीन उज्जयिनी के दक्षिण-पश्चिम कोने की सुरक्षा देवी हैं। बता दें कि राजा विक्रमादित्य और राजा भर्तृहरि की अनेक कथाएं इस स्थान से जुड़ी हुई हैं। माता की भव्य प्रतिमा और यह स्थान नाथ संप्रदाय की परंपरा से जुड़ा हुआ है। यह स्थान नगर के प्राचीन कच्चे परकोटे पर स्थित है। इसलिए लोग माता को नगर कोट की रानी भी कहते हैं।
नगरकोट की रानी के दर्शन का महत्व !
स्कंद पुराण के अवंति खंड में वर्णित नौ माताओं में से 7वीं देवी नगर कोट की माता कहलाती हैं। यह मंदिर उज्जैन शहर की उत्तर-पूर्व दिशा में स्थित है। इस मंदिर में एक जलकुंड मौजूद है, जिसे परमारकालीन माना जाता है। मंदिर में एक अन्य गुप्त कालीन मंदिर भी स्थित है, जो कि महादेव शिव के पुत्र कार्तिकेय का है। ऐसा कहा जाता है कि उज्जैन में नवरात्रि में अन्य देवी मंदिर के दर्शन के बाद नगरकोट रानी के दीदार जरुरी है. इस मंदिर में रोज भारी तादाद में श्रद्धालुओं की भीड़ इकठ्ठा होती है। नवरात्र में यहां सुबह से लेकर रात तक श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है।
उज्जैन को सभी तीर्थों में प्रमुख और स्वर्ग से भी बढ़कर माना जाता है, क्योंकि यहां 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक महाकाल ज्योतिर्लिंग, 108 शक्तिपीठों में से दो गढ़ कालिका और माता हरसिद्धि का मंदिर हैं। यहां पर श्मशान, ऊषर, क्षेत्र, पीठ एवं वन- ये 5 विशेष संयोग एक ही स्थल पर उपलब्ध हैं। यह संयोग उज्जैन की महिमा को और भी अधिक गरिमामय बनाता है। इस नगर की रक्षा करने वाली माता को नगरकोट की रानी कहते हैं।
1. नगर का अर्थ शहर और कोट का अर्थ होता है नगर की परिधि में बनी दीवार। इसीलिए यहां की माता को नगरकोट की रक्षक रानी माता कहा जाता है।
2. नगरकोट की रानी प्राचीन उज्जयिनी के दक्षिण-पश्चिम कोने की सुरक्षा देवी है। राजा विक्रमादित्य और राजा भर्तृहरि की अनेक कथाएं इस स्थान से जुड़ी हुई हैं। यह स्थान नाथ संप्रदाय की परंपरा से जुड़ा है। यह स्थान नगर के प्राचीन कच्चे परकोटे पर स्थित है इसलिए इसे नगरकोट की रानी कहा कहा जाता है।
3. हालांकि यह यह मंदिर उज्जैन शहर की उत्तर पूर्व दिशा में स्थित है। इस मंदिर में एक जलकुंड है जो कि परमारकालीन माना जाता है। मंदिर में एक अन्य गुप्त कालीन मंदिर भी है जो कि शिवपुत्र कार्तिकेय का है।
4. ऐसी मान्यता है कि उज्जैन में नवरात्रि में अन्य माता मंदिर के दर्शन नगरकोट की रानी माता के बगैर अधूरे माने जाते हैं। वैसे तो इस मंदिर में हर दिन या विशेष अवसरों पर श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है लेकिन नवरात्रि में यहां सुबह से लेकर रात तक श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। सुबह और शाम के समय भव्य आरती होती है तो नगाड़ों, घंटियों की गूंज से वातावरण आच्छादित हो उठता है।
5. उज्जैन अवंतिखंड की नवमातृकाओं में सातवीं कोटरी देवी के नाम से प्रसिद्ध है नगरकोट की रानी माता। स्कंद पुराण के अवंतिका क्षेत्र महात्म्य में वर्णित चैबीस देवियों में से नगरकोट माता मंदिर भी है। गोरधन सागर के पास स्थित मंदिर में माता की मूर्ति भव्य और मनोहारी है।
6. उज्जैन नगर का अति प्राचीन मंदिर है चौबीस खंबा माता का मंदिर। यहां पर महालय और महामाया दोनों माता की दो देवियों की प्रतिमा द्वारा पर विराजमान हैं। सम्राट विक्रमादित्य नगरकोट की रानी के साथ ही इन देवियों की आराधना किया करते थे। यहां नगर रक्षा के लिए चौबीस खबे लगे हुए हैं इसीलिए इसे चौबीस खंबा कहते हैं। यह महाकाल के पास स्थित है। शहर में लगभग 40 देवियों और भौरवों को भोग लगाया जाता है। यहां के कलेक्टर अष्टमी पर सभी को शराब चढ़ाते हैं।
सहस्र पद विस्तीर्ण महाकाल वनं शुभम ।
द्वार माहघर्रत्नार्घ खचितं सौभ्यदिग्भवम् ।।
इस श्लोक से विदित होता है कि एक हजार पैर विस्तार वाला महाकाल-वन है जिसका द्वार बेशकीमती रत्नों से जड़ित रत्नों से जड़ित उत्तर दिशा को है। इसके अनुसार उत्तर दिशा की ओर यही प्रवेश-द्वार है।
साभार : जयति जय उज्जयिनी
24 खंबा माता मंदिर
महाकाल की नगरी में ऐसे कई देवी-देवता हैं, जो भांग और मदिरापान करते हैं. महाकाल को प्रतिदिन भांग चढ़ाई जाती है, वहीं काल भैरव दिनभर में कई लीटर शराब पी जाते हैं. इस शहर में देवी का एक मंदिर ऐसा भी है, जहां नवरात्र की महाअष्टमी के दिन कलेक्टर खुद अपने हाथों से उन्हें शराब पिलाते हैं. इसके बाद नगर पूजा के तहत समस्त देवी-देवताओं को यह भोग अर्पण किया जाता है. ये नगर का अतिप्राचीन और ऐतिहासिक मंदिर चौबीस खंभा हैं. यहां महालाया और महामाया दो देवियों की प्रतिमाएं द्वार के दोनों किनारों पर स्थापित हैं.
सम्राट विक्रमादित्य ने शुरू की थी परंपरा
ऐसी मान्यता है कि सम्राट विक्रमादित्य (Samrat Vikramaditya) के शासनकाल के दौरान नगर पर महामारी आई थी. इस पर विक्रमादित्य ने 24 खंबा माता मंदिर पर शारदीय नवरात्र के अष्टमी के दिन मदिरा का भोग लगाते हुए बली चढ़ाकर माता जी को प्रसन्न करते हुए आपदा से मुक्ति की प्रार्थना की थी तभी से शारदीय नवरात्रि में यह परंपरा चली आ रही है. लेकिन कोरोना काल में अखाड़ा परिषद अध्यक्ष रविंद्र पुरी महाराज बीमारी से मुक्ति के लिए चैत्र नवरात्रि में यह पूजन शुरु करवाया है.
सम्राट विक्रमादित्य भी इन देवियों की आराधना किया करते थे. यह मंदिर महाकालेश्वर मन्दिर के पास स्थित है. मंदिर मे 12वीं शताब्दी का एक शिलालेख लगा था, जिसमे लिखा था कि अनहीलपट्टन के राजा ने अवंतिका में व्यापार के लिए नागर और चतुवेर्दी व्यापारियों को यहां लाकर बसाया था. नगर रक्षा के लिए चौबीस खंभे लगे हैं, इसलिए इसे चौबीस खंभा दरवाजा कहते हैं.
प्राचीनकाल से चली आ रही है पूजा की परंपरा
प्राचीन समय में नवरात्र पर्व की अष्टमी पर जागीरदार, इस्तमुरार, जमींदारों द्वारा पूजन किया जाता था. आज भी यह परंपरा जारी है. जिसे कलेक्टर द्वारा निर्वहन किया जाता है. सम्राट विक्रमादित्य इन देवियों की आराधना किया करते थे. उन्हीं के समय से अष्टमी पर्व पर यहां शासकीय पूजन किए जाने की परंपरा चली आ रही है.
मंदिर मे 24 खंभे जिससे मंदिर का नाम पड़ा चौबीस खंभा माता मंदिर
बताया जाता है कि पूर्व के समय मे यह द्वार श्री महाकालेश्वर मंदिर जाने का मुख्य प्रवेश द्वार रहा होगा. जो कि उत्तर दिशा की और बना हुआ है. इस द्वार में कुल 24 खंभे लगे हुए हैं इसीलिए इस क्षेत्र को 24 खंभा माता मंदिर कहा जाता है. यह द्वार विशालकाय है यहां माता महामाया और महामाया देवी की नित्य पूजा अर्चना की जाती है. पूर्व में यहां पाड़ो की बलि दी जाती थी, लेकिन यह प्रथा कब से थी इसका उल्लेख कही भी नहीं मिलता है वर्तमान मे यहां बलि प्रथा वर्जित है.
पैदल चलकर होगी नगर पूजा
शारदीय नवरात्र की महाअष्टमी 3 अक्टूबर सोमवार को मनाई जाएगी. इस दिन नगर पूजा की जाएगी. 24 खंभा माता मंदिर में महामाया और महालाया देवी को मदिरा का भोग लगाया जाएगा. साथ ही शहर के करीब 40 देवी और भैरव मंदिरों में मदिरा का भोग लगाया जाएगा. 24 खंभा माता मंदिर पर कलेक्टर आशीष सिंह पूजन करेंगे, इसके बाद तहसीलदार, पटवारी, कोटवार हाथों में सिंदूर व हांडी लेकर 27 किलोमीटर पैदल यात्रा करेंगे.
यात्रा में सभी देवी के मंदिरों में पूजन किया जाएगा. भ्रमण का समापन अंकपात मार्ग स्थित हांडी फोड़ भैरव पर हांडी फोड़कर किया जाएगा. सम्राट विक्रमादित्य की परंपरा का आज भी शहर में निर्वहन किया जाता है. शारदीय नवरात्र की महाअष्टमी पर नगर के सभी देवी देवताओं का पूजन किया जाता है.
24 खंबा माता मंदिर पर पूजन के बाद परंपरा अनुसार साधू-संत भक्तों के साथ ढोल-बैंड (Band) के साथ 27 किलोमीटर मार्ग में मदिरा को हांडी में लेकर निकले. यात्रा मार्ग पर चामुंडा माता, भूखी माता, काल भैरव, चंडमुंड नाशिनी सहित 40 देवी, भैरव (Kaal Bhairav Temple) व हनुमान (Hanuman Mandir) मंदिरों में पूजा करेंगे. माताजी और भैरवजी को मदिरा का भोग लगाकर हनुमान मंदिरों में ध्वजा अर्पित की जाएगी. यात्रा का समापन लगभग रात 8 बजे अंकपात मार्ग स्थित हांडी फोड़ भैरव पर होगा.

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